जयपुर। छतों पर लगे सोलर पैनलों से दिन में बनने वाली बिजली अब बेकार नहीं जाएगी — वह बैटरी में जमा होगी और शाम को जब मांग सबसे ज़्यादा होती है, तब घरों तक पहुँचेगी। जयपुर डिस्कॉम (जेवीवीएनएल) राजधानी के मानसरोवर इलाके में देश की पहली ट्रांसफार्मर-स्तरीय सोडियम-आयन बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली लगाने जा रहा है। यह पायलट प्रोजेक्ट मानसरोवर स्थित केएल सैनी स्टेडियम में वितरण ट्रांसफार्मर के पास स्थापित होगा। इसके लिए डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटी मीट (DUM) 2026 के दूसरे दिन, बुधवार (28 अक्टूबर) को जयपुर डिस्कॉम और ग्लोबल एनर्जी अलायंस फॉर पीपल एंड प्लैनेट (जी-ऐप) के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए और प्रस्ताव आमंत्रण (RFP) जारी किया गया।
📌 प्रमुख बिंदु
- देश की पहली ट्रांसफार्मर-स्तरीय सोडियम-आयन बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली
- क्षमता 250 किलोवाट / 250 किलोवाट-घंटा — स्थान: केएल सैनी स्टेडियम, मानसरोवर
- दिन में रूफटॉप सोलर की अतिरिक्त बिजली स्टोर होगी, शाम के पीक आवर में इस्तेमाल
- जयपुर डिस्कॉम और जी-ऐप की साझेदारी — समझौता हुआ, RFP जारी
क्या है यह पायलट प्रोजेक्ट
इस परियोजना के तहत केएल सैनी स्टेडियम के पास लगे वितरण ट्रांसफार्मर के बगल में 250 किलोवाट क्षमता और 250 किलोवाट-घंटा भंडारण वाली सोडियम-आयन बैटरी प्रणाली लगाई जाएगी। पूरी क्षमता से चलने पर यह बैटरी करीब एक घंटे तक बिजली की आपूर्ति दे सकेगी। ट्रांसफार्मर के स्तर पर बैटरी भंडारण की यह पहल देश में अपनी तरह की पहली होगी, इसलिए इसे पायलट के रूप में शुरू किया जा रहा है, ताकि असली परिस्थितियों में तकनीक का प्रदर्शन परखा जा सके।
खबर के अनुसार, सांगानेर डिवीजन में करीब 10,400 घरों की छतों पर रूफटॉप सोलर प्लांट लगे हुए हैं। इन्हीं घरों से दिन में बनने वाली अतिरिक्त सोलर बिजली को इस बैटरी में स्टोर करने की योजना है।
कैसे काम करेगी बैटरी
दिन के समय सोलर पैनल भरपूर बिजली बनाते हैं, लेकिन उस वक़्त घरों में खपत अपेक्षाकृत कम रहती है। शाम ढलते ही तस्वीर उलट जाती है — सोलर उत्पादन घटने लगता है और ठीक उसी समय लाइट, पंखे, कूलर और एसी चलने से बिजली की मांग अपने चरम पर पहुँच जाती है। इसीलिए शाम के घंटों में ट्रांसफार्मर पर सबसे ज़्यादा दबाव पड़ता है।
नई प्रणाली इसी खाई को भरेगी। दिन में बची हुई सोलर बिजली बैटरी में जमा होगी और पीक आवर आते ही वही बिजली नेटवर्क में छोड़ दी जाएगी। इससे ट्रांसफार्मर पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव घटेगा और आपूर्ति सुचारू रखने में मदद मिलेगी।
लिथियम की जगह सोडियम क्यों?
आज ऊर्जा भंडारण के काम में ज़्यादातर लिथियम-आयन बैटरियों का इस्तेमाल होता है। इस प्रोजेक्ट में उसके विकल्प के रूप में सोडियम-आयन तकनीक को आज़माया जाएगा। पायलट के दौरान यह देखा जाएगा कि यह बैटरी कितनी कारगर साबित होती है, उसका प्रदर्शन कैसा रहता है और वह राजस्थान की तेज़ गर्मी वाली जलवायु में कितनी सफलतापूर्वक काम कर पाती है। नतीजे संतोषजनक रहे, तो भविष्य में वितरण नेटवर्क के लिए यह एक नया विकल्प बन सकता है।
किसकी क्या भूमिका
इस साझेदारी में जयपुर डिस्कॉम परियोजना के लिए जगह, तकनीकी कार्मिक और संचालन से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराएगा। वहीं जी-ऐप सिस्टम के डिज़ाइन, प्रदर्शन की निगरानी, तकनीकी सहयोग और अभियंताओं के प्रशिक्षण में मदद करेगा। दोनों संस्थाएं परियोजना के परिणाम आपस में साझा करेंगी, ताकि देश की दूसरी बिजली वितरण कंपनियां भी इस तकनीक की उपयोगिता का आकलन कर सकें।
ऊर्जा सचिव व डिस्कॉम चेयरपर्सन आरती डोगरा का कहना है कि पीक आवर में बढ़ती मांग का दबाव सबसे पहले ट्रांसफार्मर स्तर पर ही पड़ता है, और इस प्रोजेक्ट से यह आकलन होगा कि ऊर्जा भंडारण तकनीक इस दबाव को कम करने में कितनी भूमिका निभा सकती है।
आम उपभोक्ता को क्या फायदा होगा
इस प्रयोग का सीधा संबंध आम घरों की बिजली आपूर्ति से है। अगर बैटरी शाम के व्यस्त घंटों में ट्रांसफार्मर का बोझ हल्का करने में सफल रहती है, तो पीक आवर में होने वाली कटौती और रुकावटों में कमी आ सकती है। साथ ही दिन में बनी सोलर बिजली बर्बाद होने की बजाय उसी इलाके के काम आएगी, जहाँ वह पैदा हुई थी।
फिलहाल यह एक पायलट परियोजना है, यानी तकनीक की परीक्षा का चरण। इसके परिणामों के आधार पर तय होगा कि ऐसी बैटरी प्रणालियां अन्य इलाकों और दूसरी डिस्कॉमों में भी लगाई जाएं या नहीं। यदि प्रयोग सफल रहा, तो आने वाले समय में पीक आवर की बिजली कटौती से उपभोक्ताओं को काफी राहत मिल सकती है।

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